आरक्षण: कैसे मैं बार बार सोचने को मजबूर होता हूँ


February 3, 2017 Facebook Twitter LinkedIn Google+ Article


हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन समानता का समय आ चुका है।

To read it in English please click –Reservation: People make me think over it again and again

सन् 2015 में चंडीगढ़ से हरिद्वार की एक ट्रेन यात्रा में, मेरे सामने एक सज्जन बैठे फेसबुक पर सर्फिंग कर रहे थे। उनके  चेहरे के बदलते भावों से उनकी प्रतिक्रिया स्पष्ट हो रही थी। कभी कभी हंस रहे थे और कभी गंभीर हो जा रहे थे। कई बार वो  एक बार में समझ ना आने पर किसी पोस्ट को कुछ ज़ोर से भी पढ़ रहे थे। अन्ययात्री भी उनकी इस तन्मयता का आनंद ले रहे थे। वो सज्जन अचानक बहुत गंभीर हो गये और इस दफे गंभीरता का भाव उनके चेहरे पे देर तक ठहरा रहा. उन्होने पोस्ट को दुबारा भी कुछ ज़ोर सेपढ़ा।  वो अपने बगल के सहयात्री की ओर मुड़े और मोबाइल दिखाते हुए बोले ” बी जे पी इस बार काम से गयी बिहार में”। उस पोस्ट में आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत की उस बात का उल्लेख किया गया था जिसमें उन्होने बोला था की आरक्षण को हमेशा के लिए खींचते जाना समाज के लिए अच्छा नही है। सज्जन के चेहरे की भाव-भंगिमा से स्पष्ट था की उन्हें वो बात अच्छी नही लगी। उसके बाद उन्होने मोहन भागवत जी के विचारों के खिलाफ अपने विचारों की झड़ी लगा दी। उनके विचारों को सुनकर, एक अन्य नौजवान (जो मुझे पूर्वांचली लग रहा था) जो मेरे बगल में बैठा था, भी  बहस में कूद गया और एक वास्तविक जीवन की घटना के उदाहरण से वह आरक्षण के घाटे बताता चला गया.  5 मिनट के भीतर, हम सभी सहयात्रियों ने महसूस किया की नौजवान के तर्क उन सज्जन पे भारी पद रहे थे, वो अलग बात है की सज्जन उन्हीं बातों को बार बार दुहरा कर मैदान में बने रहने का दंभ भर रहे थे। वह युवक स्पष्ट रूप से आरक्षण के विचार के बिल्कुल ही खिलाफ था. खैर, इस घटना के बाद पहली बार मैं आरक्षण की संकल्पना पर विचार करने के लिए बाध्य हुआ.  हालाँकि मैं सभी स्तरों पर नौजवान आदमी के तर्क से सहमत नहीं था। इससे पहले आरक्षण हमेशा से मेरे जीवन में था, मेरे पैदा होने से पहले ही ये मौजूद था और में आरक्षण से किसी भी तारेह की असुविधा महसूस नहीं की थी।

अब फिर कुछ दिन पहले ही एक श्री मनमोहन वैद्य, प्रचार प्रमुख, आरएसएस ने उसी तर्ज पर अंबेडकर को उद्धरत करते हुए भागवत जी की बात दोहराई। मेरे दिमाग़ में तुरंत आया ” गयी भाजपा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा में”। लेकिन रुकिये, क्यों भाजपा ( या कोई भी अन्य पार्टी) एक सच बताने के लिए फिर से ख़ामियाजा भुगतेगी? यही विचार मुझे अगले प्रश्न की ओर लाती है जो  “क्या आरक्षण की पूरी अवधारणा को अब तक ग़लत तरीके से पेश किया गया है?” और मेरा जवाब एक जोरदार हाँ है।

वापस उसी पूर्वांचाली लड़के के पास चलते हैं उसने आरक्षण को पाकिस्तान के “राज्य प्रायोजित आतंकवाद” के साथ तुलना करते हुए “राज्य प्रायोजित क्रूरता” कहा था. खैर, इस तुलना में वह अतिशयोक्ति कर गया लेकिन मूलरूप में वह सही है. आरक्षण भेदभाव ख़त्म करने के लिए एक विपरीत भेदभाव ही तो है।

मेरा क्या मतलब होता है जब मैं कहता हूँ की आरक्षण की अवधारणा को हमेशा ग़लत तरीके से पेश किया गया है? राजवंशियों में और कुछ तानाशाही शासनों में हर व्यक्ति को बराबर नही माना जाता, वहाँ पर व्यक्ति की उपयोगिता के हिसाब से उसे उँचा या नीचा माना जाता है. लेकिन लोकतंत्र में हर कोई बराबर है. बराबर का मतलब है की समाज के हर एक व्यक्ति का अवसरों पर एक समान हक़ है। यह समानता ही एक लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा है।

मेरा क्या मतलब होता है जब मैं कहता हूँ की आरक्षण की अवधारणा को हमेशा ग़लत तरीके से पेश किया गया है? राजवंशियों में और कुछ तानाशाही शासनों में हर व्यक्ति को बराबर नही माना जाता, वहाँ पर व्यक्ति की उपयोगिता के हिसाब से उसे उँचा या नीचा माना जाता है। लेकिन लोकतंत्र में हर कोई बराबर है। बराबर का मतलब है की समाज के हर एक व्यक्ति का अवसरों पर एक समान हक़ है। यह समानता ही एक लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा है, तो कैसे किसी भी लोकतंत्र में कोई आरक्षण का औचित्य सिद्ध कर सकता है. जब उस पूर्वांचली  लड़के ने कहा कि “आरक्षण किसी भी लोकतंत्र के नाम पर कलंक है तो मैं शत प्रतिशत सहमत था। तो मेरा तर्क ये है की आरक्षण को एक कलंक के रूप कभी प्रचारित ही नही किया गया, इसे हर रोग की एक गोली की तरह ही पेश किया गया। अगर यह कलंक की तरह देखा जाता तो हमारी मानसिकता जितनी जल्दी हो सके इसे समाप्त करने की होती। इसे समाप्त करने के लिए हम एक बेहतरीन नियंत्रक तंत्र इस्तेमाल करते जो समयबद्ध तरीके सेपारिणाम ला पाता। इसे अन्य राष्ट्रीय एजेंडों में प्राथमिकता हासिल होती क्योंकि ये पूरे समाज की विचारधारा बदलने का मिशन था. लेकिन एक औसत से नीचे स्तर के लेखे-जोखे ने एक बेहतरीन मौका जाया कर दिया। समयबद्ध तरीके से नियंत्रण ज़रूरी था क्यूंकी इसके बिना एक समय के बाद अनारक्षित तबकों में रोष फैलना स्वाभाविक था। और वो रोष कुछ हद तक समाज में आ चुका है। अब ये पालिसी  काउंटर प्रोडक्टिव होने की राह पर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कहना कि जाति-आधारित आरक्षण को अब आर्थिक स्थिती आधारित आरक्षण की ओर ले जाना चाहिए को अन्य दल वोट बैंक की राजनीति के कारण ग़रीब विरोधी के रूप में पेश करने की कोशिश करते आए हैं। जाति-आधारित आरक्षण और आर्थिक-स्थिति आरक्षण परस्पर अनन्य (म्यूच्युयली एक्सक्लूसिव) घटनाएँ नहीं हैं। दोनों एक साथ रहकर लगातार और धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति आधारित आरक्षण के लिए रास्ता बना सकते हैं। हमने राजनैतिक लाभ के लिए आरक्षण को अनावश्यक रूप से खींच कर सामाजिक ताने बाने को कमजोर कर दिया है और तथाकथित खाई को और भी बड़ा कर दिया है। कुल मिलाकर उद्देश्य खो गया है, जो अब बदलना चाहिए।

ज़रा इन उदाहरणों पर गौर फरमाईए-

1) एक छात्र ( अ) एक परीक्षा में 872/1000 अंक लाता है और एक अन्य (ब) केवल 600/1000। ब परीक्षा पास कर जाता है और आ नही कर पाता। ब संस्था में काम करने लगता है और अच्छी जिंदगी शुरू हो जाती है। अ अगली बार और भी ज़्यादा मेहनत करता है लेकिन कोई लाभ न्ही होता। हताश होकर वो एक कंपनी में काम करने लगता है जहाँ उसे उसकी योग्यता के हिसाब से ना पैसा मिलता है ना काम। कई वर्षों में, अपनी मेहनत के बल पर उसने अनुसंधान के क्षेत्र में अच्छा काम किया जिससे विदेश में एक बेहतर अवसर मिला है। वहाँ उसने अपने पूरी क्षमता से काम किया और बहुत कम समय में अब वह उस देश की सरकार के लए सलाहकार के रूप में काम करता है। जबकि ब संस्था को बिना किसी महत्वपूर्ण योगदान के नौकरी के लाभों का आनंद ले रहे है। (प्रतिभा पलायन)

2) एक चिकित्सक है जिसकी प्रेक्टिस बहुत अच्छी चलती है और अपने ग्राहकों को और अधिक मूल्य देने के लिए सर्जन बनना चाहता है। वह शल्य चिकित्सा की डिग्री के लिए एक प्रतिष्ठित कॉलेज की प्रवेश परीक्षा देता है लेकिन अर्हता प्राप्त करने में विफल रहता है। उसी परीक्षा में औसत प्रेक्टिस वाला एक और चिकित्सक आरक्षण के कारण उत्तीर्ण हो जाता है। तो जो व्यक्ति ऐसी डिग्री के लिए स्वाभाविक चयन होना चाहिए था वो अपने भाग्य के भरोसे रह गया और एक दूसरा व्यक्ति कम योग्यता के बाद भी आगे बढ़ गया। समाज को कौन ज़्यादा चाहिए, ये समझना मुश्किल नही है। (प्रतिभा विरोधी)

3) राजस्थान में गुर्जर समुदाय ने आरक्षण की माँग की और उनकी ताक़त दिखाने के लिए पूरा प्रदेश बंद करवा दिया। उनसे प्रेरित होकर हरियाणा के जाट भी आरक्षण की माँग करने लगे। जाट अपने आंदोलन को और भी शक्तिशाली दिखाने के लिए हिंसक हो उठते हैं। संबंधित राज्यों की सरकार उनकी माँग पर विचार करने के लिए उन्हें आश्वासन भी देती हैं। कई अन्य जातियों (यहाँ तक ​​कि ब्राह्मण) भी आने वाले समय में प्रेरित हो सकते हैं और यह दुश्चक्र जारी रह सकता है। ( आरक्षणहमेशा रहेगा और यह समस्याओं का एक समाधान है की धारणा का प्रेषन)

4) एक व्यस्त जिला अस्पताल में एक लड़का अपने बीमार पिता के साथ आता है. वह सीधे एक डॉक्टर के पास चला जाता है और उसे अक्षम होने का आरोप लगाकर एक बखेड़ा खड़ा करता है. पता चला कि वह अपने पिता को पाँचवे या छठवे समय ला रहा था, लेकिन उनकी हालत हर बार ज़्यादा बिगड़ती गयी। उसने डॉक्टर से कहा की यदि सामान्य श्रेणी का कोई डॉक्टर उनकी जगह होता तो उसका पिता इस समय तक ठीक हो गया होता। उस लड़के ने तो भारी भीड़ के बीच यह तक माँग कर डाली कि प्रत्येक सरकारी कर्मचारी की श्रेणी (सामान्य या आरक्षित) उसके नाम के साथ अनिवार्य रूप से उल्लेखित होना चाहिए। (समाज में आम जनता के लए और आयेज की आंतरिक विभाजन में नाराज़गी)

ये सभी उदाहरण वास्तविक जीवन से लिए गये हैं। आप इन सभी उदाहरणों में तर्क वितर्क ढूढ़ सकते हैं लेकिन ये समस्याएं भी वास्तविकता हैं। आप कैसे आरक्षण के कारण हो रहे प्रतिभा पलायन (जो वैश्वीकरण के इस युग में भारत लंबे समय तक नही झेल सकता) को नकार सकते हैं। लोग क्यों ऐसा मानने को प्रेरित हो रहे हैं कि आरक्षण से ही उनका भला संभव है। क्यों लोग आरक्षण की छतरी के बाहर नाखुश हैं और अंदर आकर खुश होना चाहते हैं।

अब मैं समाधान पर आता हूँ। बहुत सारे समाधान बुद्धिजीवियों ने सुझाए हैं जो आप सब भी गाहे-बगाहे जानते हैं, इसलिए मैं समाधान की फिलॉसोफी पर केंद्रित रहूँगा। ऐसी नीतियों से नीति निर्माताओं का परम लक्ष्य आर्थिक रूप से ज़रूरतमंद व्यक्ति को सशक्त बनाना होता है। अभी कुछ समय से, प्रौद्योगिकी की प्रगति और सरकारों की राजनीतिक इच्छाशक्ति में कुछ सकारात्मक बदलाव के कारण, मुझे नहीं लगता की जाति-आधारित आरक्षण को आर्थिक-स्थिति आधारित आरक्षण से बदलना  मुश्किल होगा।

मेरी राय में समाधान निम्नलिखित चरणों मैं होनाचाहिए-

1) शीघ्रातिशीघ्र हर नागरिक को एक ही मंच पर ले आओ यानी हर किसी के लिए आधार कार्ड। प्रत्येक नागरिक का एक ही मंच पर होना नीति निर्माताओं के लिए वरदान सा होता है। यह नीति निर्माताओं के लिए बेहतर जानकारी और नीति के कार्यान्वयन पर बेहतर नियंत्रण प्रदान करता है। महत्व के हर लेन-देन को आधार संख्या से जोड़ना अनिवार्य बनाने एवं समाज में मौजूद विभिन्न आर्थिक वर्गों की बेहतर पहचान के लिए आधार के एल्गोरिथ्म को सक्षम करना ज़रूरी है।

2) एक बार में आरक्षण ख़त्म करना ना व्यावहारिक है और ना ही वांच्छनीय है। यह धीरे-धीरे और मजबूत सिद्धांतों पर आधारित हो. लंबे समय से चले आ रहे आरक्षण के कारण आरक्षित वर्गों के भीतर भी सबल और निर्बल वर्ग बन चुके हैं।  इन कक्षाओं की पहचान ज़रूरी है। अब जो लोग आरक्षण का लाभ उठा कर एक अच्छे स्तर तक पहुँच चुके हैं उन्हें सतत आधार पर आरक्षित श्रेणियों से बाहर किया जाना चाहिए।

3) अब क्योंकि आरक्षित तबके के तहत लोगों को धीरे धीरे कम किया जा रहा है, उतना आरक्षण आर्थिक-स्थिति आधारित आरक्षण को  आवंटित करो। धीरे-धीरे इस जाति-आधारित आरक्षण को कम करो और आर्थिक-स्थिति आधारित आरक्षण को बढ़ाते जाओ।

वर्तमान आरक्षण प्रणाली में सुशासन कभी था ही नहीं पर आर्थिक-स्थिति आधारित प्रणाली पर जबरदस्त सुशासन चाहिए होगा।  समयबद्ध लक्ष्य और कार्यान्वयन पर कड़ा नियंत्रण पर किसी भी कीमत पर कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए। बदली परिस्थितियों में समानता का लक्ष्य भी रणनीति बदल कर ही हासिल होगा। अब हमें अपने समाज से हमेशा के लिए इस कलंक को दूर करने की ज़रूरत है।  “हर भारतीय के लए समान अवसर” अब और ज़्यादा देर तक एक सपना नहीं बना रह सकता।

 

आई.के. तिवारी

अस्वीकरण: इस ब्लॉग में व्यक्त विचार पूर्णतः लेखक के हैं। वेबसाइट सतीकता, पूर्णता, व्यावहारिकता या इस ब्लॉग में व्यक्त किसी भी तथ्य की सच्चाई के लिए ज़िम्मेदार नहीं है। सहमति के बिना इस ब्लॉग का उपयोग कहीं और करने पर क़ानूनी कार्यवाही हो सकती है।



Comments
  1. Best Writing Service said on February 16, 2017 8:57 am:

    Best Writing Service

    Get an expert academic writing assistance. We can write any paper on any subject within the tightest deadline.