श्री बलराज थापा से हुई बातचीत के अंश


September 14, 2016 Facebook Twitter LinkedIn Google+ Interviews


 

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श्री बलराज थापा त्यूनी, चकराता उत्तराखंड मानवाधिकार एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं और कई सामाजिक कार्यों से भी जुड़े हैं। उनकी एक्टिविटी सोशल मीडिया में भी देखने को मिलती है। अपने क्षेत्र और समाज के उत्थान के लिए वो क्या कर रहे हैं, ये जानने के लिए हमने उनसे बात की..पेश हैं श्री बलराज थापा से हुई बातचीत के अंश

1- आप कैसे समाज को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं?

मैं इतना बड़ा समाज सेवी तो नहीं हूं, भला हो फ़ेसबुक का जिसने आपको मुझ तक पहुंचा दिया। मैं एक गरीब परिवार से हूँ और बचपन से बहुत सी परेशानियां झेली हैं। एक मामूली किसान का बेटा होने के कारण कई मुश्किलों को झेला। इसीलिए कई परेशानियों को बचपन से महसूस कर रहा हूँ। इसी लिए मेरा रुझान समाज सेवा की तरफ गया और मैं कई संगठनों से जुड़ गया । मैं अकेला इस काम को नहीं कर सकता मेरे कई साथी और संगठन मेरे साथ हैं। फिलहाल जौनसार इलाके में समाज हित का कोई मुद्दा मेरे सामने आता है तो मैं संबंधित अधिकारी,  नेता या मीडिया तक बात पहुंचा देता हूँ। मीडिया से मजबूत देश का कोई तंत्र नहीं हो सकता।

2- आपके क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या क्या है? कैसे आप समस्याओं को सुलझाने के प्रयास कर रहे हैं?

हमारे क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या आपस में तालमेल की कमी है। सारा बोझ नेताओं के उपर डाल दिया जाता है..हर जिम्मेदारी उन पर डाल दी जाती है। ये नहीं सोचा जाता कि जब नेताओं के पास आप अपनी समस्या,  क्षेत्र की समस्या नहीं लेकर जाएंगे तब तक उन्हें पता कैसे चलेगा? बिना रोये तो माँ भी बच्चे को दूध नही पिलाती। यहाँ के लोग व्यक्तिगत काम ज्यादा करवाते हैं और सार्वजनिक कम। मेरा लोगों को यही सुझाव रहता है कि सार्वजनिक समस्याएँ,  सड़क,  पानी,  बिजली,  शौचालय,  स्कूल, अस्पताल, खेल का मैदान  आदि पर फोकस किया जाए। हालांकि मंत्री प्रीतम सिंह जी द्वारा क्षेत्र का काफी विकास किया गया है फिर भी काफी करना बाकी है। पूर्व मे इनके पिता स्वर्गीय गुलाब सिंह जी जो मंत्री भी रहे, के प्रयासों से इस क्षेत्र को जनजाति का दर्जा मिला था, इसी कारण आज जौनसार बावर के लोग आरक्षण के कारण सरकारी नौकरियां कर रहे हैं। लेकिन बड़े अफसरों ने कोठियां बना ली हैं और देश के अलग अलग कोनों में बस गए हैं। अपने गांव की वो सुध नहीं लेते। उनकी माँ, बहनें कहाँ से पानी ढो रही हैं, बूढ़े दादा- दादी के चलने के लिए गांव मे रास्ता ठीक ठाक है या नही? इसकी परवाह उन्हें नहीं है। ये क्षेत्र का दुर्भाग्य है।

3– ये क्षेत्र अगर रेलवे से जुड़ जाए तो और तरक्की हो सकती है…इस इलाके में कब तक रेल नेटवर्क लाने का वादा किया गया है?

मेरी ये सोच है की जब चीन ल्हासा – शिगास्ते,  जो हमारे बहुत करीब है तक रेल लाइन लाइन बिछाई जा सकती है तो हमारी सरकार क्यों नही ऐसा कर सकती? क्यों हाथ पर हाथ रख कर बैठी है। जबकि उत्तराखंड के चारों धामों व हनोल के महासू देवता के दर्शनों को देश विदेश से लोग आते है। ये काम कोई मुश्किल नही बस दृढ़ इच्छा शक्ति की जरुरत है। और संभव भी तभी होगा जब प्रत्येक आदमी आवाज उठाएगा। मैंने अखबारों मे पड़ा था की कर्ण प्रयाग रेल लाइन के साथ साथ अँग्रेजों ने मसूरी एवं जौनसार बावर का सर्वे किया था, सहिया में प्लेटफार्म एवं मसूरी में सुरंग का काम शुरू कर दिया गया था तभी भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू हुआ और वे अपना बोरिया बिस्तर लपेट चले गये। हम लोग ठगे रह गये, यदि 10-20 साल  अंग्रेज यहीं रहें होते तो पहाडों के चप्पे चप्पे में रेललाइन होती क्योंकि उन्हें पहाड़ों से प्रेम था। आज भी उनके बनाए रेस्ट हाउस ऐसी उचाईयों पर कथियान, मोल्टा, मोराच आदि स्थानो पर मौजूद हैं…जहां उस समय चिड़िया का पहुंचना ही संभव था मानव का नहीं। यदि चीन की नीयत ख़राब हो जाये तो हमारी सेना पीठ पर लाद कर कितनी सामग्री, काठगोदाम, देहरादून, शिमला, जम्मू से पहुंचा पायेगी? अब इसका जवाब तो आप माननीय मुख्यमंत्री उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू कश्मीर एवं माननीय प्रधानमंत्री जी से ही लीजिये।

4- रेल पटरियों के बिछने से इस इलाके का कैसे विकास हो सकता है?

रेल पटरियों को बिछाने से नहीं, रेल चलने से इनका विकास होगा, एक मजदूर से लेकर बड़े बड़े कारोबारी उसका लाभ उठा सकते हैं। आज हर गांव के अधिकतर लोग रोजगार की कमी से पलायन कर गए हैं। यहां की विकट समस्याएं एवं आर्थिक अभाव से रोजगार की तलाश में देश विदेश में कार्य कर रहे हैं। सच कहूँ तो पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी ही पहाड़ के काम नहीं आ रही है। सरकार ने मात्र एक ही बाँध इच्छाड़ी डैम बनाया था और लखबाड़, व्यासी अभी तक तैयार नहीं हुआ जबकि डाकपत्थर से नीचे इन्ही नदियों में कई डैम बन चुके हैं। बड़ी मुश्किल से टिहरी डैम फ़िलहाल तैयार हुआ है। किसाऊ, त्यूनी-पलासू  योजना 30 साल से लटकी पड़ी हैं। यदि 20-30 साल पहले छोटे- छोटे डैम  हिमाचल की देखा देखी बनते। गंगा, यमुना, टोंस, रुपिन, सुपिन में डैम बनाए जाते तो हमारा उत्तराखंड आज ऊर्जा प्रदेश होता। और पहाड़ की जवानी यानी जन शक्ति पलायन कर देश-विदेश में न जम गयी होती। जो मात्र तीज त्योहारों मे ही कभी अपने पत्रक गांव मे दिखाई देती है।

5- जौनसार बावर का इलाका ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से अहम है… क्या क्या खास बातें हैं यहां कि.?

जौनसार बावर के चप्पे-चप्पे में इतिहास एवं धार्मिक आस्था विराजमान है। बाड़वाला जगत ग्राम में अश्वमेध यज्ञ स्थल, कटापथर में नेपाली राजा का महल और बीन नदी में अर्जुन द्वारा भीष्म पितामह को बाणों की शैया पर पानी पिलाने से निकली जल धारा है। माँ काली मंदिर, जहाँ से पांडव लाक्षागृह से बच कर बाहर निकले थे।  कालसी में अशोक शिला लेख, कोथी भोंदी में रणथम्भौर का किला, थैना महासू मंदिर, लखबाड़ महासू मंदिर, राजा विराट का किला विराटखायी, लाखामंडल (लाक्षागृह), टाइगर फाल, चकराता रामताल गार्डन, देवबन, मुंडाली, कोटि कनासर, खडम्बा, कथियान, भटारीधार गुफा, पत्थर के बीच मे जलकुंड (कात्यान से 10 किमी सराह कुंड जो की परियों का कुंड है; और श्रीगुल देवता का मंदिर है, यहाँ बैसाख के महीने मेला लगता है। रवाई और जौनसार बावर के आस्था का केंद्र बिंदु है), पौराणिक सीढ़ियाँ (डांगुठा), श्रीगुल महाराज मंदिर (भटाड), मोल्टा रेस्ट हाउस, हनोल महासू मंदिर, चार महासू देवताओं की जननी देवलाडी माता मंदिर मेन्द्रथ, शिड़कुड़िया महाराज मंदिर रायगी, रेस्ट हाउस मोराच आदि कई दर्शनीय स्थल है। इसके अलावा छीवरों पावार हाउस, कोटी, इच्छाड़ी डैम, चूडू, श्रीगुल, विजट महाराज मंदिर सिमोग, परशुराम मंदिर बोहरी गांव, कुकुर्शी महाराज मंदिर गवेला आदि आस्था के केंद्र एवम कुवांणु और अणु की जमीनें जो तराई को भी मात देती है।

6- ये इलाका इतनी अहमियत रखता है लेकिन फिर भी ये टूरिज्म मैप पर नहीं है…ऐसा क्यूं ? क्या कमी लगती है और कमियों को कैसे पूरा किया जा सकता है?

इस पर मैं टिप्पणी नही कर सकता ये उच्च स्तरीय बात है। इस का जवाब तो सरकार दे सकती है। मैं तो बस यही कह सकता हूँ की यदि प्रचार प्रसार हो और आगमन की सुविधा अच्छी हो तो यहाँ पर पर्यटन के लिए अपार संभावनाएं है। मैं तो यहाँ तक कहूंगा की यदि इन को रोपवे या मेट्रो से आपस में जोड़ा जाए तो यहाँ बहुत कुछ हो सकता है। जिससे पलायन रुकेगा व बेरोजगारी दूर होगी।

7- समाज में बदलाव लाने के लिए आपका मूलमंत्र क्या है?

समाज मे व्याप्त कमियाँ निरंतर प्रयास से ही दूर की जा सकती है। जिसके लिए लोगों को मानव अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा। कौटिल्य ने कहा है की “समाज का दुष्टों से उतना नुकसान नही होता जितना सज्जनों की निष्क्रियता से”। हर व्यक्ति को समाज की कमी के प्रति जागरूक होना चाहिए तभी वास्तव मे हम इकीसवीं सदी का एहसास कर पायेंगे।

 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : व्यक्त किए गए विचार श्री बलराज थापा के निजी विचार हैं।



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