Nanda Devi Rajjat Yatra


October 8, 2015 Facebook Twitter LinkedIn Google+ Article


सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां।

जिंदगानी गर रह भी गई तो नौजवानी फिर कहां।

राहुल सांस्कृत्यायन जिंदगी भर घूमते रहे और लिखते रहे। दुनिया से भी वो घूमने की गुजारिश करते हैं लेकिन हम जैसे नौजवानों के नसीब में घूमना कहा। करियर बनाने के टेंशन में कितने साल गुजर गए पता ही नहीं लगा। पीछे मुड़कर नजर डालों तो करियर वहीं का वहीं पड़ा नजर आता है। न जिंदगी के साल बचे और न ही नौजवानी। ऊपर से EMI’s का महीने का जेबफाड़ू पंजा भविष्य की सोच को तोड़मरोड़कर रखने के लिए काफी है लेकिन इस बार मैं मायावी दुनिया के बनावटी जालों से ऊपर उठा और नंदादेवी राजजात में शामिल हुआ।

वैसे उम्मीदों के पहाड़ साल 2000 से ही काफी ऊंचे उठने लगे थे। अल्मोड़ा कॉलेज के उनदिनों में भी मेरी आदत अखबार पढ़ने की तो थी ही। अगस्त के महीने में एक के बाद एक नंदादेवी राजजात की खबरें आने लगी। मां नंदा की कहानियां, चौसिंघा मेढ़ा, दुर्गम रास्तों और अलग-अलग जगहों से जुड़ी किवदंतियों ने उत्सुकता को कई गुना बढ़ा दिया। तब यात्रा में जाना मुमकिन तो नहीं था लेकिन मन में संकल्प जरूर कर लिया था कि बारह साल बाद होने वाली यात्रा में जरूर शिरकत की जाएगी। वैसे लोग अपने होने वाले दूल्हे या दुल्हन के लिए ख्वाब सजाते होंगे लेकिन साल दो हजार के बाद के हर साल में मैंने राजजात के लिए ख्वाब सजाए। नियम के मुताबिक साल 2012 में यात्रा होनी थी लेकिन मलमास की वजह से 2012 में राजजात नहीं हो पाई हालांकि तब भी मैं अपने दोस्तों से ये जरूर कहता था कि अगर यात्रा के लिए मुझे ऑफिस से छुट्टी नहीं मिली तो नौकरी छोड़ दूंगा..वैसे ये मौका मुझे मिल नहीं पाया। 2013 में उत्तराखंड की आपदा ने नंदादेवी राजजात का रास्ता रोक लिया लेकिन इस बार यानी 2014 में मां नंदा अपने ससुराल विदा हुईं।

मीडिया की मजबूरियों के बीच मीडियाकर्मियों की भी अपनी मजबूरियां हैं। अव्वल तो ऐन मौके पर छुट्टियां नहीं मिलती और अगर छुट्टियां मिल भी गईं तो लंबी नहीं मिलती।15 दिन की छुट्टी मांग लो तो लगता है कि जैसे कोई गुनाह कर लिया लेकिन खुद को मैं भाग्यशाली ही कहूंगा कि मुझे दस दिन की छुट्टियां अगस्त के अंतिम महीने में मिल ही गईं।

इस ट्रैवलॉग की असल कहानी वाण से शुरु होती है। अगर मैं नंदादेवी राजजात के 280 किलोमीटर लंबे रूट की कहानी लिखने लगा तो पाठकों के साथ भी नाइंसाफी हो जाएगी। मैं इस कहानी की शुरूआत वाण से करता हूं, क्योंकि एडवेंचर यहीं से शुरू होता है। चमोली का आखिरी कस्बा वाण। आबादी करीब दो से तीन हजार लोगों की। वाण तक हमारा पूरा ग्रुप जीप से पहुंचा। हम दस लोगों की टोली। टोली में पच्चीस से साठ की उम्र के लोग और इन सबमें एक बेहद जवांदिल और हंसमुख शख्स विनोद, जिसने इस यात्रा के हर पड़ाव को अपनी बेलौगपन से जीवंत बना दिया। शरीर की हर नस को तोड़मरोड़ कर रख देने वाली चढ़ाईयां यूं पार न कर पाते हम, अगर विनोद हमारे साथ न होता।

वैसे मैं एक बात और बता दूं, मेरी इस नंदादेवी यात्रा में आस्था से ऊपर एडवेंचर था। हमारी टोली यात्रा से दो पड़ाव आगे चल रही थी यानी जिस दिन हम वाण पहुंचे उस दिन मां नंदा की डोली फल्दिया गांव में थी। करीब बारह हजार फीट की ऊंचाई में बसा वाण वो गांव है जिसके आगे आबादी नहीं है। आज की रात हमें वाण में ही काटनी थी। शाम के वक्त बारिश होना बड़ा लाजमी है यहां। ढलान पर बसा गांव और गांव के बीच में बहते साफ पहाड़ी नाले यानी गधेरे का पानी ये अहसास कराता है कि इस गांव में रहने की आधी दिक्कत तो मानो यूं ही खत्म हो गई। ऊंचाई में बसे पहाड़ के गांव तो पानी की कमी से बुरी तरह जूझ रहे हैं। प्राकृतिक स्रोत सूख चुके हैं और जल योजनाएं आधी ..सरकार के भ्रष्टाचार ने खत्म कर दी और आधी.. गांववालों के उत्पात ने।

समस्या रात काटने की थी तो दो टोलियां बनाकर पहले मुकम्मल जगह तलाश करने को भेज दी गईं। मैं जिस टोली में था, उस टोली को गांव के बीचों बीच एक मकान नजर आया। मकान के आंगन में खाना तैयार हो रहा था। चाय उबल रही थी। सर्द मौसम में उबलती चाय जुबान पर पानी लाने का दम रखती है। पूरे गांव में इस तरह की अस्थाई दुकानें आंगनों में खुली थी। राजजात को देखते हुए स्थानीय लोगों ने दो पैसे कमाने का तरीका ढूंढ निकाला था वर्ना इस आखिरी गांव में इस तरह ठहरने वाले सिर्फ सीजन में ही नजर आते हैं। रात काटने के लिए घर का मालिक हमें मिल चुका था। हमें ठिकाने की जरूरत थी, हमें लगा घर के मालिक को रुपयों की जरूरत होगी। हमारी तरफ से पैसे ऑफर किए गए लेकिन दूसरी तरफ से एक जोरदार नमस्कार हमारी तरफ उछला और कहा गया कि- साहब हम शरण देते हैं लेकिन पैसे नहीं लेते, आप फ्री में इस घर में रह लीजिए। दरअसल वाण की ये परंपरा बेहद पुरानी है। यहां के भोले भाले लोग सदियों से घर को खुला रखते हैं ताकि उनके घर को थका मांदा परदेसी पनाह ले सके। मोदी जी के अच्छे दिन पता नहीं कब आएंगे लेकिन इस गांव के अच्छे दिन सदियों से है और इनके अच्छे दिन नेताओं की वजह से नहीं बल्कि खुद इस गांव की जनता की वजह से आए हैं। गांव वाले चाहते हैं कि उनके अच्छे दिनों से दुनिया भी सबक ले। तेरा-मेरा और अहम की लड़ाईयों को इस तरह अपने घर के दरवाजे खोलकर भी खत्म किया जा सकता है। बहरहाल घर मिल चुका था। हमें घर की ऊपरी मंजिल में शरण मिली थी। इस मंजिल में पहुंचने का रास्ता थी, हटाई जा सकने वाली सीढ़ियां जो निचली मंजिल से लगी हुईं थी। लकड़ी की सीढ़ी पर जैसे जैसे कदम बढ़ाए तो लगा मानो पाताल से स्वर्ग जाने के रास्ते में एक नई दुनिया मिल गई हो। एक ऐसी दुनिया जहां रहस्य की पर्त बिछी हुई है। किसे पता अगले ही मोड़ पर क्या हो। घर की ऊपरी मंजिल बिल्कुल साफ सुथरी थी। गाय के गोबर से लिपा हुआ मिट्टी का पाल। एक सौंधी खुश्बू जो देशज होने का अहसास कराती है। पत्थर की पटालों से बनी छत जो आड़ी तिरछी लकड़ियों से ऐसे टिकी होती है मानो किसी मिस्त्री ने नहीं बल्कि किसी चित्रकार ने ये घर बना दिया हो। पहाड़ के पाखेवाले मकानों की सबसे बड़ी खासियत यही होती है कि वो गरमी में ठंडे और सर्दियों में गरम होते हैं। बहरहाल सामान इस ठिकाने में रखा जा चुका था और जगह कब्जा करने की जुगत भिड़ाई जा रही थी। इसी बीच घर की निचली मंजिल पर जोशीमठ से आई हुईं महिलाओं को पनाह दे दी गई थी। जगह कम थी महिलाएं ज्यादा, इसलिए घर के चारों तरफ आलथी-पालथी मारकर महिलाएं बैठ गई थी। पहाड़ में महिलाएं ही क्रिएटर हैं। वो घर संभालती हैं। खेतों में अन्न उपजाती हैं। जंगलों में जब घास काटने जाती हैं तो अपने दुखों को गीतों में ढालती हैं। न्योली के रुप में ये दारुण गीत पहाड़ियों की बदनसीबी की करुण दास्तां हैं। ऐसे देखा जाए तो पहाड़ की महिलाएं गीतकार भी हैं। घर की निचली मंजिल से स्वर लहरियां कानों में गूंजने लगी थी। उन शब्दों को समझना मुश्किल था लेकिन एक स्वर में कई महिलाओं के वो शब्द लोरियों के जखीरों को भी मात देने की शक्ति रखते थे। महिलाओं के कोमल गीतों के झोकों के बीच कब नींद आई पता ही नहीं लगा।

वाण की सुबह सर्द थी। जब तक नींद खुली तब तक गांव के घरों से सफेद धुंआ कई मीटर ऊपर उठ चुका था। लोग अपने काम पर जुट चुके थे। गांव की तलहटी में एक और गधेरा था, उसी गधेरे के ठंडे पानी से दिन की शुरुआत हुई। सुबह का नाश्ता कर लेने के बाद आगे का सफर शुरु किया गया। जाते जाते वाण गांव में लाटू देवता के मंदिर के दर्शन भी किए गए। लाटू देवता को मां नंदा का धर्मभाई कहा जाता है। इस मंदिर में साल में एक ही बार पूजा होती है और पुजारी आंख और मुंह में पट्टी बांधकर पूजा करता है। माना जाता है कि भगवान यहां यर्थाथ रूप में हैं।

सूरज चढ़ने लगा था लेकिन तपिश नहीं थी। मैदानों में रहने वाले मुझ जैसे शख्स को चढ़ते सूरज से दहशत हो सकती है लेकिन इस जगह हर किसी को सूरज से प्यार है। यहां बांहे पसार कर किरणों का स्वागत होता है क्योंकि इस सर्द इलाके में सूरज ही ऊर्जा का स्रोत है। वेदनी बुग्याल के लिए हमारी यात्रा शुरु हो चुकी थी। वाण से वेदनी बुग्याल की दूरी करीब उन्नीस किलोमीटर है। वैसे उन्नीस किलोमीटर कुछ ज्यादा दूरी नहीं लगती। पहले मैं भी इसी मुगालते में था लेकिन बाद में चढ़ाई में अटकती हर सांस ने पहाड़ों से इस बात कि तौबा कि की अब से कभी भी पहाड़ों को अंडरइस्टिमेट नहीं करुंगा। सफर मुश्किल था, सुनी सुनाई बातें भी कई थी, सफर को आसान बनाने के लिए लाठियां खरीद ली गईं, जिनकी कीमत पांच रुपए थी। ये लाठी पूरे सफर में मेरे साथ रही, अब सोचता हूं कि अगर दो पांवों के अलावा लाठी नहीं होती तो यात्रा करना असंभव था।

कंधे में ट्रैकिंग बैग, जो ना ना कहते कहते करीब दस किलो वजनी बन चुका था और हाथ में स्लीपिंग बैग लिए रास्ता पार हो रहा था। वाण से करीब दो किलोमीटर ऊपर चढ़ने के बाद हम एक ऐसे टीले पर थे जिसके एक तरफ वाण की गहराई थी तो दूसरी तरफ त्रिशूल पर्वत की ऊंचाई। बर्फ से आच्छादित पर्वत और चौड़े पत्तियों वाले पेड़ों की खत्म न होने वाली श्रृंखलाएं किसी को भी सुमित्रानंदन पंत या विलियम वर्ड्सवथ बना सकती हैं। पहाड़ में निर्जन जगहों पर दुकानें किसी मायावी करिश्मे से कम नहीं होती। मेरा निजी तर्जुबा है कि कड़ी थकान में पहाड़ी दुकानों की चाय और आलू के गुटकों में थकान दूर करने की जादुई शक्ति तो होती ही है।

बहरहाल मंजिल अभी दूर थी, इस पड़ाव से आगे रास्ता समानांतर था और उसके बाद एक पहाड़ी नाले को जोड़ने वाली हल्की ढलान। ढलान पार करने के बाद खड़ी चढ़ाई सबके हौसलों को कड़ी चुनौती देने को तैयार थी। वेदनी बुग्याल की तलहटी से, ऊपर की तरफ नज़र दौड़ाओ तो सिर को कुछ इतना उठाना पड़ता है कि सिर की टोपी जमीन पर आ जाए। बहरहाल, कंधे के भारी बोझ ने सिर को इतना ऊंचा उठाने की इजाजत सिर्फ एक दो बार ही दी, बाकी समय ट्रैकिंग बैग के बोझ ने कंधे और सिर दोनों को झुकाए रखा।

धीमे-धीमे कदमों से तीखी चढ़ाई पार हो रही थी।बेहद संकरे रास्ते में मां के भक्तों की तादात अच्छी खासी थी। उस ट्रैक में ऊपर आने-जाने वालों की अच्छी खासी संख्या थी। उसी रास्ते पर आदमी भी थे और घोड़े-खच्चर भी। घोड़े-खच्चरों पर सामान लादकर वेदनी भेजा जा रहा था क्योंकि दो दिन बाद वहां मां नंदा की राजजात पहुंचने वाली थी और प्रशासन टेंट और लंगर लगाने के इंतजाम में जुटा हुआ था। रास्ता इतना संकरा कि जरा सी गलती खाई में पहुंचा सकती है। अगर आपसे गलती नहीं हुई लेकिन किसी घोड़े-खच्चर ने आपको जरा सी ऐड़ लगा दी तो काम तमाम होने में देर नहीं लगेगी।

लेकिन इन मुश्किल रास्तों में भी मां नंदा से लोगों की प्रीत लगी हुई थी। मां के जयकारे कुछ पल के लिए थकान की लकीरों को दूर कर रहे थे। रास्ता तय करने वालों में कुछ वाण की महिलाएं भी थी। काले रंग का घाघरा, काली कमीज और काले रंग की ही वेस्टकटनुमा कोटी, सिर पर साफा और कमर में सफेद पट्टा… पहने ये महिलाएं मां नंदा के ससुराल जाने के विरह गीत के सुर फिजाओं में घोल रही थीं। न जाने कितनी सदियों से इन महिलाओं को इन विरह गीतों की थाती मिली होगी। एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में न जाने कब से इन गीतों ने सफर तय किया होगा। देवदार,बांज,बुरांश के जंगलों में विरह के ये गीत न जाने किस नोस्टेलजिया को जन्म देते हैं। न जाने दिल के किस कोने से उभरा दर्द आंखों को गीला कर जाता है और आंखों को इस आहट का अहसास भी नहीं होता। विरह गीत गाते हुए इन महिलाओं के आंखों में आंसू थे, इन आंसूओं में आस्था और चट्टान से जिंदगी के दरकते खंडों के पानी को साफ-साफ और अलग-अलग पहचाना जा सकता है।

वेदनी बुग्याल की तीखी चढ़ाई खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी, हर चोटी दमखम को चुनौती देती जान पड़ रही थी।मैंने अपनी शक्ति बचाने के लिए मौन साधा हुआ था।वैसे मैं मन ही मन खुद को कोस रहा था कि आखिर मुझे अपने बैग में इतना सामान भरने की जरूरत क्या थी। तरतीब से जोड़े गए पत्थरों को पहाड़ में खड़न्जा कहा जाता है, खड़न्जे के हर पत्थर पर एक-एक कदम रखना भी मुश्किल हो रहा था। जब शरीर पूरी तरह से थक जाता तो पूरी टीम को हॉल्ट करने का निर्देश दे दिया जाता। कुछ मिनटों के आराम के लम्हों में जंगल की तारीफ के अलावा टीम के वरिष्ठों की नसीहतों का पुलिंदा भी खुलता। उसके बाद फिर सफर शुरु हो जाता, लेकिन थोड़ी देर चलने के बाद ही सांसों की धौंकनी शुरु हो जाती। दिल की धड़कन, कानों तक साफ-साफ गूंजने लगती।

बहरहाल गैरोली पातल आ चुका था और इस बात का संतोष भी जागने लगा कि अब मंजिल ज्यादा दूर नहीं क्योंकि वेदनी बुग्याल यहां से सिर्फ तीन किलोमीटर की चढ़ाई पर रह गया था। गैरोली पाताल नंदा देवी राजजात का एक पड़ाव है। यात्रा एक रात यहां रुकती है। इस जगह पर चाय पीकर नई ताजगी के साथ यात्रा फिर शुरू की गई। इसी गैरोली पाताल में आज से करीब डेढ़ हजार साल पहले मुझ जैसा ही शख्स देवदार के एक पेड़ के नीचे बैठा था। ये शख्स गढ़वाल के उन अंचलों से आया था, जहां मां नंदा की बेहद मान्यता है। जहां नंदा घर की बेटी से भी लाडली है। डेढ़ हजार साल पहले भी ये यात्रा आम जनता की ही थी और आज भी ये आम जनता की ही यात्रा है। भले ही पंद्रहवी शताब्दी में राजा अजयशाह पाल ने इस यात्रा में राज शब्द जोड़कर इसे राजजात बना दिया हो लेकिन राजा और रंक जिस यात्रा में एक साथ शिरकत कर सकें वो यात्रा सिर्फ नंदा देवी राजजात ही हो सकती है।

गैरोली पातल से ऊपर चलते हुए हम कदम दर कदम पहाड़ों से ऊपर उठते जा रहे थे, अनगिनत पहाड़ कदमों के नीचे नजर आ रहे थे। आकाश में अटखेलियां करते हुए बादल मुट्ठियों की जद में थे। पेड़ छोटे से छोटे होते जा रहे थे और घास के मैदानों की दुनिया शुरु होने जा रही थी।

कांपते पैर अचानक ठिठक गए थे। चेहरे तक आए पसीने की बूंदों ने जमीन पर गिरने की जरूरत नहीं समझी। तीखी चढ़ाई से हाफती सांसों पर जैसे कुछ पल-का विराम लग गया हो। पैरों के नीचे मखमली चादर बिछी हुई थी। आंखों की वर्णता को जो हर ले.. हरे मैदानों का वो तिलिस्मी संसार नजरों के आगे था। वेदनी बुग्याल की हरियाली बांहें पसारे हमारा इंतजार कर रही थी। बुग्याल यानी घास के चारागाह। मानो किसी अदीब ने अंधेरे में तरतीब से घास से हरा गलीचा बुन दिया हो। मीलों मील तक फैली हरियाली को आप जादुई अनुभवों का संसार नहीं कहोगे तो और क्या कहोगे? इस घास के गलीचे को और भी सुंदर बनाने के लिए सौ फीट की ऊंचाई में एक खामोश झील न जाने कितने वर्षों से पहाड़ों का सारा पानी खुद में समेटे हुए है और न जाने फिर कहां और किस गहराईयों में इस झील का पानी विलीन हो जाता है। ऊंचाई से देखने पर ये झील वेदनी बुग्याल के माथे की बिंदी नजर आती है। शायद इसीलिए त्रिशूल पर्वत की इस तलहटी को शिव का आंगन कहा जाता है। वाकई में ऐसे आंगन तो भगवान के ही हो सकते हैं। वेदनी बुग्याल में भक्तों के ठहरने के लिए सरकारी टेंट लग चुके थे। वाण से लगातार चलने के बाद थकान हावी थी। पांव बुरी तरह दर्द करने लगे थे। एक टेंट में कुछ देर आराम करने के बाद भूख सताने लगी तो पास में ही एक टिन शेड पर नजर गई। ये टिन शेड एक स्थानीय दुकानदार का था और उसमें खाने का इंतजाम किया गया था। भर पेट दाल-चावल और अचार कि कीमत सौ रुपए तय थी। दाल-चावल की प्लेट की कीमत सौ रुपए भले ही बाहर की दुनिया को ज्यादा लगे लेकिन मैं समझता हूं, उन परिस्थितियों के लिए ये रेट वाजिब है। उसी दुकानदार ने बताया कि वाण से वेदनी तक खच्चर में एक बार में सामान ढोने की कीमत सात सौ रुपए हो चुकी है। भर पेट खाना खाने के बाद मैं वापस टेंट में पहुंच चुका था।

लेकिन तब तक हमारी टोली ने आगे बढ़ने का फैसला कर लिया था। फैसला ये हुआ कि आज की रात वेदनी में नहीं बल्कि पातर नचनियां में बिताई जाएगी। कुछ लोग आगे बढ़ चुके थे, लेकिन बारिश होने लगी। एक तो थकावट और ऊपर से बारिश..अंजान रास्ता और मंजिल का पता नहीं। ऐसी स्थिति किसी के भी हौंसले कमजोर कर सकती है। कुछ मीटर का फासला तय कर चुके लोगों को वापस बुला लिया गया। टोली के दस के दस सदस्य ये फैसला नहीं कर पा रहे थे कि आगे जाएं या नहीं, लेकिन अनमना- सा ही सही लेकिन आगे बढ़ने का फैसला लिया गया। बारिश का गिरना जारी था और हमारा दल अगले पड़ाव की तरफ कूच कर चुका था।

बड़े शहरों में रहकर कई बार जिंदगी मांद में दुबके नेवले की तरह हो जाती है। बाहरी दुनिया से बिल्कुल कटी हुई जिंदगी। जिसमें सिर्फ और सिर्फ एक ही शख्स के लिए जगह होती है और वो शख्स हम खुद ही होते हैं। ‘अहम’ के लिए जिंदगी बिताने में कई बार जिंदगी मशीनी हो जाती है। रोबोट की तरह दिन शुरू होता है और उसी तरह खत्म भी हो जाता है लेकिन आस्था के लिए उमड़ा जन-सैलाब चेतना को झकझोरता है। लगता है मानो किसी पवित्र आवाज़ ने गहरी नींद से जगा दिया हो। पूरा अंचल नंदा देवी की भक्ति में डूबा था। दूर-दराज के गांवों की जनता मां की छंतोलियों के दर्शन के लिए उमड़ पड़ी थी। नंदा देवी आराध्य के अलावा हर घर की बेटी की तरफ भी है। हर किसी के मन में मां नंदा के लिए समान प्रेम। हजारों लोगों की ये अगाध श्रद्धा मुझ जैसे लोगों को अपने बने बनाए खोलों से बाहर निकलने में मदद करती है।

वेदनी से हम करीब एक किलोमीटर ऊपर चढ़ चुके थे, वेदनी बुग्याल सुंदर से और सुंदर होता जा रहा था। ऊंचाई में जाते हुए वेदनी बुग्याल पीछे छूट रहा था लेकिन इसके बाद भी वो नज़रों से ओझल नहीं हुआ था। पलट कर देखते तो हरी घास का वो खुला मैदान वैसे का वैसा ही नजर आता। हां, सफर तय करने के साथ अंतर ये आ गया था कि वेदनी नजरों के सामने छोटे से और छोटा होता जा रहा था। कई किलोमीटर ऊपर चढ़ चुकने के बाद भी वेदनी जैसे का तैसा अपनी ही जगह पर था। साथ में चल रहे कैलाश ने कहा कि वेदनी तो पीछा ही नहीं छोड़ रहा। जितनी भी दूरी तय कर लो, ऐसा लगता है कि वेदनी हमारे साथ ही चल रहा हो।

करीब बारह किलोमीटर की कमरतोड़ चढ़ाई के बाद हमारा दल पातर नचनियां में था। यहां एसडीआरएफ का कैंप लगा था और चाय-बिस्कुट के साथ हमारा स्वागत किया गया। शाम का अंधेरा गहराने लगा था। शुभ्र चोटियों पर धूप के गुच्छे अभी भी मंडरा रहे थे। इतने करीब से पर्वतों को मैंने पहली बार देखा था। इतने नजदीक कि मानो हाथ की जद में पहाड़ आ गए हों। ये जगह करीब साढ़े सोलह हजार फीट की ऊंचाई पर है। यहां हवाओं का रुख ज्यादा तीखा हो गया था। बर्फ से ढकी पहाड़ियों से वापस लौटी हवा चेहरे को सुन्न कर रही थी।

किवदंतियों के मुताबिक कन्नौज के राजा ने यात्रा के दौरान इस जगह पर अपनी महफिल जमाई। उस महफिल में सुंदरियों ने नृत्य किया और पूरी रातभर राजा की महफिल चली। इस शांत जगह पर एक राजा के इस दुस्साहस से देवता नाराज़ हो गए और महफिल में मौजूद लोगों को पत्थरों में तब्दील कर दिया गया।

शाम रात में तब्दील होने ही वाली थी। यात्रियों के रहने के लिए एसडीआरएफ के इस बेस कैंप से करीब दो सौ मीटर की ढलान पर इंतजाम किया गया था लेकिन थकान इतनी ज्यादा थी कि पांव अपनी जगह से उठने मुश्किल थे। एसडीआरएफ के इस कैंप के ठीक बगल में पॉलीथीन की शीट से झोपड़ीनुमा घर बना हुआ था। ये झोपड़ी थी, घोड़ा-खच्चर चलाने वाले एक शख्स की। स्वभाव से बेहद सरल इस शख्स ने हम सभी को अपनी झोपड़ी में शरण दे दी। बातचीत से पता लगा कि यात्रा के दौरान दो पैसे ज्यादा कमाने के लिए इसने चाय और मैगी का भी इंतजाम किया था। झोपड़ी का आकार इतना था कि दस लोग आराम से बैठ सकते थे। झोपड़ी की शुरुआत में ही भट्टी सुलगाई गई थी, ठंड से बचने के लिए इससे अच्छा इंतजाम क्या हो सकता था। रात के खाने का इंतजाम एसडीआरएफ के कैंप की तरफ से किया गया था। रात को ठंड से बचने के लिए विनोद कहीं से एक दरी का इंतजाम कर लाया था। बारिश शुरु हो चुकी थी और मैंने झोपड़ी के सबसे अंदरुनी हिस्से पर कब्जा कर लिया था। इस जगह तक ठंडी हवा नहीं आ सकती थी और नीचे दरी और मैट्रस बिछा हो तो धरती की शीत से भी अच्छा बचाव हो सकता था। बेहद ज्यादा थकान होने से नींद कब आई पता नहीं लगा। सुबह आंख खुली तो उजाला हो चुका था। बाहर आए तो स्वागत बर्फ से हुआ। रात को चोटियों में हिमपात हुआ था। पहले से बर्फ से ढके पहाड़ और लकदक हो चुके थे। दिशा मैदान जाने के बाद सुबह करीब आठ बजे रुपकुंड की तरफ कारवां कूच हुआ।सामान झोपड़ी में ही छोड़ने का फैसला लिया गया था क्योंकि जाना सिर्फ रुपकुंड तक ही था। उससे आगे जाने की इज़ाजत न तो परिस्थितियां दे रही थी और न ही शरीर। पातर नचनियां से रूपकुंड की दूरी करीब बारह किलोमीटर है।

बारह किलोमीटर की ये चढ़ाई सबसे मुश्किल चढ़ाईयों में शुमार है। पातर नचनियां से करीब एक किलोमीटर ऊपर चढ़ लेने के बाद शरीर जवाब देने लगा। सांसे उखड़ने लगी थी, ऊंचाई होने की वजह से ऑक्सीजन कम से कमतर होती जा रही थी। जब शरीर पूरी तरह जवाब दे जाता तो आराम सबसे अच्छा विकल्प होता। लेकिन आराम के दौरान जब ऊपर की चढ़ाई पर नजर जाती तो उत्साह आधा हो जाता। वैसे ही जैसे रामायण में बाली के सामने जो भी लड़ाका आता था, उसकी शक्ति खुद-ब-खुद आधी हो जाती। अंग्रेजी के जेड के आकार के रास्ते अपने नियम से ही आपको आगे ले जाते हैं। यहां शॉर्टकट की कोई गुंजाइश नहीं है। कलवा विनायक पहुंचकर लगा की बड़ी जंग जीत ली है। उच्च हिमालयी क्षेत्र के कठिन रास्तों पर विजय पाने का ये तथाकथित मौका तो था ही हालांकि सच्चाई यही है कि इन पहाड़ों के सामने आदमी की कोई औकात ही नहीं। लेकिन मनुष्य की फितरत में ही खुद को बड़ा साबित करने की हनक है। फिर चाहे ये कोई मुगालता ही क्यों न हो।

कलवा विनायक की चोटी पर पहुंचकर त्रिशूल पर्वत को और करीब से देखा जा सकता था। किसी छाते की तरफ सफेद पर्वत ठीक हमारे सिर के ऊपर थे। कलवा विनायक से आगे हल्की ढलान थी और फिर समानांतर रास्ता। ऐसा रास्ता भगवा बासा कैंप तक है। भगवा बासा तक जाने में शरीर को ज्यादा परेशानी नहीं हुई। भगवा बासा में दो चाय की दुकानें इंतजार कर रही थीं। दुकान में बैठे बैठे ही रूपकुंड की चढ़ाई पर नजर गई। दिल इस चढ़ाई को देखकर ही बैठा जा रहा था। चाय पीकर आगे का सफर शुरू किया गया। खड़ी सीढ़ी-सी तीखी चढ़ाई पहले फीट से ही इम्तिहान लेने लगी थी। ऑक्सीजन कम हो गई थी इसलिए थकान ज्यादा लग रही थी और सिर्फ पचास मीटर चलकर ही आराम करने की जरूरत महसूस हो रही थी। हालांकि रास्ते में खिले ब्रह्मकमल थकान दूर कर रहे थे। ब्रह्मकमल को उत्तराखंड सरकार ने राजकीय फूल घोषित किया है। हल्के हरे रंग का ये फूल बेहद दुर्लभ प्रजाती का है और उच्च हिमालयी क्षेत्र में ही ये फूल खिलता है। राजजात यात्रा के दौरान ब्रह्मकमल को काफी नुकसान हुआ है। बाद में अल्मोड़ा में एक शख्स ने मुझे बताया कि ब्रह्मकमल नज़र से बचाता है। बात बेहद बचकानी है लेकिन जनमानस जनश्रुतियों पर विश्वास नहीं बल्कि अंधविश्वास करता है और कई बार प्रकृति को इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता है।

पत्थरों पर इक्का-दुक्का जगह रूपकुंड की दूरी लिखी गई थी। भगवा बासा से कुछ आगे एक पत्थर में ये दूरी तीन किलोमीटर लिखी गई थी लेकिन ये तीन किलोमीटर का फासला तीन सौ किलोमीटर लग रहा था। मुझे लगता है कि ऐसी ट्रैकिंग में किलोमीटर में लिखे गए ये फासले सिर्फ दिल को बहलाने के लिए होते हैं। एक सांत्वना देने के लिए कि मंजिल अब दूर नहीं। लेकिन मंजिल को पाने में प्रकृति कितनी परीक्षा लेगी, इसका अंदाजा तो बाद में ही लगाया जा सकता है। सांसें तेज थी, दिल जोरों से धड़क रहा था। सिर उठाकर मंजिल पर नजर तो जा रही थी लेकिन मंजिल थी की आने का नाम ही नहीं ले रही थी। ऊपर से नीचे आने वाले हर यात्री से मैं यही पूछ रहा था कि रूपकुंड अभी कितना दूर है? सभी उंगलियों के इशारे से यही जवाब देते की वो रहा रूपकुंड। लेकिन उंगलियों के इशारों से बिल्कुल पास नजर आ रहा रूपकुंड लंबी शारिरीक थकावट के बाद आने वाला था। इस चढ़ाई में भी विनोद का दमखम बना हुआ था। रूपकुंड का रास्ता बेहद संकरा था, जरा सी गलती भी भारी पड़ सकती थी। हम त्रिशूल पर्वत के बिल्कुल निचले हिस्से में थे। साथियों ने विनोद से तीस सेकंड के अंदर ऊपर जाकर बर्फ के एक लोदे को छूकर आने की शर्त लगाई। विनोद को इसी मौके की तलाश थी। संकरे रास्ता छोड़कर विनोद ऊपर दर्रे की तरफ भागने लगा था। कंकड़, पत्थर रास्ता रोक सकते थे लेकिन वो धुन का पक्का था। समय से पहले वो बर्फ को छूकर वापस रास्ते पर आ चुका था। हम सब थके हुए थे लेकिन विनोद के चेहरे पर थकान मौजूद नहीं थी।

जैसे जैसे दर्रों का रास्ता पार हो रहा था वैसे वैसे चिड़चिड़ाहट बढ़ रही थी। विनोद ने मेरी फटी हुई लोअर की तरफ इशारा किया तो मैंने बेरुखी से कहा कि- मैं यहां माडलिंग करने नहीं आया। दिमाग तक ऑक्सीजन के कम पहुंचने की वजह से ऊंचाई पर ऐसी समस्या आती है। इसके अलावा जी मितलाने, उल्टी, चक्कर आने का भी बराबर खतरा रहता है। ये हाई माउंटेन डिजीज़ किसी को भी अपनी जकड़ में ले सकते हैं।

रूपकुंड में सबसे पहले पहुंचने वाला शख्स विनोद था। विनोद ऊपर पहुंचकर पताका पहरा रहा था और हमें धीरज बंधा रहा था कि बस मंजिल आ चुकी है। रूपकुंड पहुंचकर में थककर निढाल पड़ गया। कुछ देर आराम करने के बाद चेतना वापस लौटी और ये समझ आने लगा कि मैं वहां पहुंच चुका हूं जिसका सपना कई वर्षों से संजोया था। शिव-पार्वती के मंदिर से शुरु होता ये है रूपकुंड। साढ़े सत्रह हजार फीट की ऊंचाई पर एक पानी के कुंड का होना अपने आप में आश्चर्य की बात है और इस कुंड को रहस्य के पर्तों में समेटती जहां तहां बिखरी हुई मानव अस्थियां। मंदिर के पास ही हड्डियों का एक जखीरा बना दिया गया था। हाथ,पांव की हड्डियां, हड्डियों में चिपका मांस का लोथड़ा, कपाल…..मानों इन्हीं प्रेतों का यहां शासन चलता हो। लेकिन मानव अस्थियों का राजकाज सिर्फ इस जखीरे तक ही सिमटा नहीं है। कुंड के पूरे व्यास में ये अस्थियां बिखरी हुई हैं। जैसे जैसे हम दाईं तरफ से कुंड के किनारे किनारे गए वैसे वैसे हड्डियां ही हड्डियां फैली नजर आई। इन अस्थियों के बारे में किवदंतियां कई हैं लेकिन मैं यहां पर वैज्ञानिक तथ्य का उल्लेख करूंगा। कई खोजों के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि ये हड्डियां करीब छह सौ से एक हजार स्थानीय निवासियों की हैं। इनकी मौत आठवीं से नौंवी सदी के बीच हुई और कारण था ओले। क्रिकेट की गेंद या उससे थोड़े बड़े आकार के ओलों के गिरने से लोगों की बड़ी तादात में मौत हुई। सिर पर और कंधे के अलावा पूरे शरीर पर कहीं भी चोट के निशान नहीं पाए गए।इसी के बाद वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि इनकी मौत बड़े ओलों से हुई होगी। ऐसा भी संभव हो सकता है कि स्थानीय लोग नंदादेवी राजजात में शामिल हुए हो और प्रकृति के कोप का शिकार हो गए हों।

मान्यता के मुताबिक मां नंदा ने इसी झील में अपने सौंदर्य को निहारा था, इसलिए इसका नाम रूपकुंड पड़ा। कहा ये भी जाता है कि भगवान शिव के त्रिशूल के वार से रूपकुंड का जन्म हुआ।

तीन तरफ से बर्फ की चादर कुंड में लटक रही थी। कुंड का स्याह-नीला पानी बर्फ की सफेदी के परावर्तन से भी अपना रंग नहीं बदल रहा था। कुंड का पानी इतना ठंडा था कि बिजली का करंट फीका पड़ जाए। बारह बजते बजते यहां मौसम भी करवट लेने लगता है। धुंध के सफेद सफेद रोए कुंड को घेरने लगे थे। पूरी घाटी सफेद आगोश में समाए जा रही थी। रूपकुंड को निहारने के बाद हम शिव-पार्वती के मंदिर में खड़े थे और दाए तरफ जोरांगली की खड़ी चढ़ाई अभेद्य दुर्ग की तरह खड़ी थी। पूरी यात्रा में जोरांगली की चढ़ाई को सबसे दुश्कर माना जाता है। इस चढ़ाई के बाद शिलासमंदर का पड़ाव आता है और उसके बाद होमकुंड, जहां से मां नंदा को विदाई दी जाती है। होमकुंड में ही चौसिंघे मेढे को आजाद कर दिया जाता है। माना जाता है कि मेढ़ा ही मां को ससुराल तक विदा करता है।

खैर हमें आगे जाना नहीं था, हमारा सफर सिर्फ रूपकुंड तक ही था। रूपकुंड के सौंदर्य को निहारने के बाद विदा लेने का समय था। दिन के करीब तीन बज चुके थे। ढलान पर उतरते हुए भी ख्याल रूपकुंड की सुंदरता के ही थे। नीचे उतरते समय शरीर की बैचैनी भी कम होने लगी थी क्योंकि ऑक्सीजन का स्तर बढ़ रहा था लेकिन ढलान में उतरते हुए पांवों पर खासा जोर पड़ रहा था। भगवा बासा से होते हुए कलवा विनायक पहुंचे तो पातर नचनियां के कैंप नजर आने लगे थे, हमें ताज्जुब भी हो रहा था कि हम जैसे कमजोर दिल के लोगों ने इस प्रचंड चढ़ाई पर विजय प्राप्त की थी। हालांकि ऊंचाई पर चढ़ना मुश्किल था तो ढलान में उतरना भी उतना ही मुश्किल था लेकिन लाठी की मदद से एक-एक गज की दूरी पार की गई। पातर नचनियां में खाना खाकर वेदनी को कारवां लौटा। बारिश होने लगी थी, बरसाती ओढ़ ली गई। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। ज्यादा बारिश से चलना मुश्किल हो गया था। लाठी को टिकाकर ही कदम आगे बढ़ रहे थे। कुछ देर बाद वेदनी बुग्याल नजर आने लगा था। सूरज का धूप छांव का खेल चारागाह के ठीक ऊपर खेला जा रहा था। मानो ये कवायद बुग्याल को और सुंदर बनाने के लिए हो।

कल के मुकाबले आज वेदनी बुग्याल में टेंटों की तादात कई गुना बढ़ चुकी थी। हरी घास के बीच नीले-पीले, हरे लाल टेंटों का जखीरा कुदरत की इस देन को बदनुमा बना रहे थे। करीब पचास हजार लोग वेदनी पहुंच चुके थे। हालांकि नंदादेवी राजजात दूसरे दिन यहां पहुंचने वाली थी लेकिन लोगों ने पहले दिन से ही वेदनी में डेरा डालना ज्यादा मुनासिब समझा। वेदनी की मखमली घास को कदमों तले रौंदा जा रहा था। शांत वातावरण को लाउडस्पीकर के शोर से छलनी किया जा रहा था। मुझे पातर नचनियां में महफिल जमाने वाले उस राजा की किवदंती याद आ रही थी। भगवान ने उसे माफ नहीं किया, आशा करता हूं, वेदनी बुग्याल को पिकनिक स्पॉट बनाने वाले लोग, जिनमें हम भी शामिल हैं..को भगवान माफ करेंगे।

वेदनी में हमें रात बिताने के लिए कोई ठिकाना नहीं मिला, यहां अव्यवस्थाओं का साम्राज्य फैला हुआ था। उत्तराखंड सरकार के सारे दावे यहां फेल होते नजर आ रहे थे। रात हो चुकी थी और हमने रात में ही नीचे उतरने का फैसला लिया। वेदनी के नीचे का पड़ाव गैरोली पातल था, गैरोली पातल में उस दिन राजजात का पड़ाव भी था। रात के अंधेरे में फिसलन भरी ढलान को पार करना मुश्किल था। लाठी के सहारे तीन किलोमीटर के उस रास्ते को बिना किसी परेशानी के पार कर लिया गया। गैरोली पातल में भीड़ कुछ कम थी लेकिन हालात यहां भी खराब थे। हमें यहां भी ठिकाना नहीं मिला ऐसे में टीम ने खुले में ही सोने का फैसला किया। बारिश की वजह से वहां सूखी जमीन तलाश करना करीब-करीब असंभव था लेकिन फिर भी एक ठीक ठाक जमीन का इंतजाम कर लिया गया। लाठियों के सहारे प्लास्टिक शीट से एक कामचलाउ छत बनाली गई। जमीन पर बिछाने के लिए इत्तेफाक से प्लास्टिक की शीट मिल गई। बिना खाए, स्लीपिंग बैग में सभी लोग दुबक गए। थकान ज्यादा थी, इसलिए रात कब कटी पता भी नहीं लगा।

सुबह उठते ही मां नंदा की छंतोलिया वेदनी की तरफ जाने लगीं थी। सुबह सुबह मां नंदा के दर्शन किए। माता से इस बात के लिए भी क्षमा मांगी की, उनसे पहले ही हम रुपकुंड तक हो आए थे। पहाड़ी अंचल में नंदादेवी राजजात भगवान और भक्त के बीच भावनात्मक संबंधों का सबसे महान उदाहरण है.. मां नंदा को लोग अपनी बेटी मानते हैं और उन्हें विदा करने त्रिशूल पर्वत के रास्ते में, जहां तक संभव हो सके वहां तक आते हैं।

गैरोली पातल से वाण का सफर शुरु हो गया था। तीखा ढलान..पांव पर अच्छा खासा जोर डाल रहा था। मेरे दल के लोग आगे थे, मैं सबसे पीछे था। कछुए की रफ्तार से चलकर मैं वाण तक पहुंच ही गया था। वाण के बाद जीप से घर की तरफ रवानगी हो गई। रूपकुंड तक की यात्रा का ये समापन था। राजजात के बाद मैं फिर अपनी दुनिया में लौट गया हूं। जिंदगी फिर उसी रफ्तार से चल रही है। काफी समय बाद जब मैं अपनी जिंदगी का विश्लेषण करने बैठूंगा तो मैं जरूर अपनी जिंदगी को प्री नंदादेवी राजजात यात्रा और पोस्ट नंदादेवी राजजात यात्रा में वर्गीकृत कर रहा हूंगा।

 

संजय बिष्ट

इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार



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